
"होलिका बुआ" के "फिउनरल सेरेमनी" का "रंगीला" जश्न मनाने के बाद भी "खुमारी" अभी बाकी है! मोहल्ले के लौंडो के साथ "लोकल राधाओं" को"तनमन " से "लठमार "होली खेलते देख कर समझ गया कि "यौवन"कि "सुनामी" क्या होतीहै! जब चौतरफा "लव" कि "लहरें" उठ रही हो तो"तन"का "तापमान" और "मन"का "दबाव" बर्दाश्त करना कठिन हो जाताहै! बदन का "अणु-अणु" चरमरा उठताहै!"नैनो"का "विकिरण" सौ गुना बढ़ जाताहै...अब तो "होली"भी "हाईटेक" हो चुकी है ...कानो पर "मोबाइल" चिपकाये,हाथो कि "पन्नी" में "गुलाल" लिए इतनी "आतुरता"से जुटा है मानो यही से "अगली" के "गाल" लाल,पीले,नीले कर देगा!"मानिटर"पर "वर्चुअल होली"खेलने वाले,भले ही "बैक ग्राउंड" में "रंग बरसे भीगे चुनर वाली"बजाते रहे मगर जींस,टॉप,कैप्री,के ज़माने में "चूनर"ही नहीं बची तो "भिगोने" के लिए "चुनरवाली"कहाँ मिलेगी....."खोया" कहीं "खो"चुका है!"गुझिया" गुज़र चुकी है!"लिप्स"को "चिप्स" नहीं "बिप्स" भाते है!"राधा"का"रूप"वही हो गया है जो "पेरिस हिल्टन" का है!"मार्डन होली'"में "शीला","मुन्नी",नहीं "लेडी गागा","शकीरा" होतीहै! नकली "द्रौपदी" अपना "चीर" पकडे खड़ी है कोई खींचे!"लालच" गुलाल,अबीर "बेईमान" हो चुका है ऐसे में "कोर्ट" "सरकार" का "चीर" न खीचे तो "वृहन्नला" कहलायेगी!
वैसे कुछ भी हो भाई साब,फागुनी "उमंगों" कि "धड़कने" अभी भी "जवान" है,यू नो माई "मनवा"....नई पीढ़ी के इंद्रधनुषी रंगों को देखकर क्या क्या ख़याल आते है.................................... लाल..."महंगाई का तेवर",पीला...बेचारा "आम इन्सान",जिसकी "सुर्खी" महंगाई ने छीन ली है, नीला..हरा...जाने दीजिये इन पर तो "पार्टियों" ने "कब्ज़ा' कर लिया है रह गया "केसरिया" रंग...यानि होलियारों का रंग...!मस्ती का रंग...!!परम्पराओं का रंग....!!! याद है भाई साब,बसंत पंचमी से होरियारों कि टोली....! फगुआ,चौताल गाते हुए,नाचते हुए.....!!पूरे होली तक...!!!अब ना तो वो"गाने" वाले है,ना "सुनने" वाले...हां "नाचने" वाले अभी भी "बचे" है "डी.जे".और "भोजपुरी धुनों" पर....अपने "ज़माने" में तो ढेर सारे "टेसू" के "फूल" में थोडा सा "चूना" डाल कर "आँगन" में "माँ" "भगोने" में उबालती थी..ऐसा "चटख" "रंग' बनता था कि उसकी "खुशबू","ठंढक" और "छाप" "राम नवमी" तक बनी रहती थी!आज तो पुरानी "यादों" को "दोहराने" के लिए "चार टेसू" भी नहीं "मयस्सर' है! "केसरिया' "रंग' देख कर "माँ" याद आती है....."टेसू" उबाल दिए है!"थाली" में अबीर रख दिया है!सभी के "माथे" पर लगा कर "पैर' छू लेना..!"बड़ो" का "आशीष" जिंदगी में तमाम "रंग" भर देता है,जो "ताउम्र' नहीं "उतरते" है..और हां ज़ल्दी से "सफ़ेद कमीज़" पहन कर 'सामने" आओ,"केसरिया"रंग तो "टेस्ट' कर लूँ !!!

आज कि "पीढ़ी"से कोई "शिकवा"नहीं,मगर जो "यादों"में है उसे "बाँट" तो सकते है... "माँ" कहती थी एक "वक़्त" आएगा जब उतनी बड़ी "ख़ाली टोकरी" भी नहीं नसीब होगी,जिसमे भर भर के "गुझिया" खाई है.......भाई साब,आज होरियारे,टेसू,फगुआ,चौताल भले ना बचे हो मगर 'पैर" छूकर "आशीष" आज भी लिया जा सकता है!'होली" के "रंग" उतर जायेंगे मगर "आशीष" का "रंग" हमेशा "चमकता" रहेगा..."माँ" ऐसा भी कहती थी.....होली मुबारक हो!!!!!1